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भारत चीन की कहानी – कर्नल बी बी वत्स की जुबानी – 4

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सत्रहवें करमापा को शरण देने से खीझा चीन

जनवरी 2000 में जब दलाईलामा का उत्तराधिकारी सत्रहवां करमापा चीन के कब्जे से किसी तरह छूटकर हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में आ गया। दलाइलामा को भारत में शरण देने से नाराज चीन सत्रहवे करमापा के भारत पहुंचने से और झुंझला गया। इसके बाद चीन सरहद पर छुटपुट घटनाएं चलती रहीं।

17th karmapa lama

लेकिन 2000 में जब चीन ने अक्साई चीन इलाके की वास्तविक नियंत्रण रेखा के करीब 5 किलोमीटर भीतर पक्की सडक़ बना ली जिसका भारत सरकार सिर्फ मौखिक विरोध से ज्यादा कुछ नहीं कर सके।

एनडीए सरकार के दौरान घुसपैठ के बाद चीन के हौसले बढ़े और यूपीए सरकार के दौरान (2008-2014) लद्दाख में गलवान घाटी के आसपास के लगभग सात हजार वर्ग किलोमीटर के इलाके पर कब्जा कर लिया। तब भी हमारी सरकार ने विरोध करने के सिवाए कुछ नहीं किया।

यहां तक कि 2009 में जब हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंंह अरूणाचल के दौरे पर गए तो चीन ने उनकी इस याात्रा का यह कहकर विरोध किया कि भारतीय प्रधानमंत्री उनकी जमीन पर नहीं आ सकते।

Dalai lama and 17th karmapa lama

इसके पहले 2007 में अरूणाचल के मुख्यमंत्री दोरजी खांडू ने चीन यात्रा के लिए वीसा मांगा तो चीन ने उन्हें यह कहते हुए वीसा देने से इंकाार कर दिया कि अरूणाचल प्रदेश चीन का हिस्सा है, इसलिए उन्हेें अपने देश में आने के लिए वीसा की जरूरत ही नहीं है। यही नहीं उसने जम्मू एंड कश्मीर के लोगों को अलग से वीसा(नत्थी वीसा) देकर चिढ़ाया।

अप्रेल 2013 में जब भारत में केंद्र सरकार के खिलाफ बड़ा आंदोलन चल रहा था तभी चीन ने पूर्वी लद्दाख के देपसांग इलाके में घुसपैठ करते हुए एलएसी से करीब 19 किमी भीतर तक आ गया था। उसका दावा था कि वह झिनझियांग प्रांत का हिस्सा है।किंतु जब भारतीय सेना ने प्रतिकार किया तो चीनी सैनिक   थोड़ा पीछे लौट गए। उनकी यही नीति है आगे बढ़ो, कब्जा करो, प्रतिरोध हो तो कुछ पीछे हट जाओ न हो तो आगे बढ़ जाओ।

2014 में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में एनडीए की मजबूत सरकार बनीं तो शुरू दो तीन साल तक चीन भारत स दोस्ती की पींग बढ़ाने का स्वांग करता रहा। फिर अचानक 2017 में उसने भारत, चीन और भूटान के जंक्शन यानि डोकलाम क्षेत्र में कब्जा करने की कोशिश की। यहां चीन की मंशा साफ थी और वही थी जिसकी बात करने पर शरजील इमाम को राजद्रोह का मुकदमा झेलना पड़ा।

डोकलाम क्षेत्र ऐसी जगह है जिसे चिकन नेक भी कहां जाता है। यानि यहां भारत की उत्तर भारत से जोडऩे वाला इलाका मात्र चालीस किमी चौड़ा हैऔर उसके बाद बांगला देश है। यानि चीन का मंसूबा भी भारत के वामपंथी एक्टीविस्ट की तरह इस चालीस किमी इलाके को हथिया कर पूरे उत्तरपूर्वी भारत को अलग करने की रणनीति के तहत आया था।

doklam

Doklam

छवि स्रोत – theprint.in

लेकिन डोकलाम में उम्मीद के विपरीत भारतीय सेना का अलग ही रूप देखने को मिला। लगभग 3 महीने की जद्दोजहद के बाद चीन को अपने कदम पूरी तरह पीछे खींचना पड़े।

भारतीय सेना की चीनी सेना पर यह बहुत बड़ी मनोवैज्ञानिक जीत थी, जिसने उसमें हौसला भरा कि चीनी फौज से मुकाबला किया जा सकता है और यही जज्बा आज भी भारतीय सेना लद्दाख के गलवान घाटी और पेंगोग्सो झील के इलाके में दिखा रही है। (जारी…)

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