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भारत चीन की कहानी – कर्नल बी बी वत्स की जुबानी – 11

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मौजूदा परिस्थितियों में भारत और चीन के विकल्प

पिछले कुछ दिनों में हमने भारत चीन के सम्बंधों के अलग-अलग आयामों का विष्लेषण किया। अब हम इन परिस्थितियों में भारत और चीन के विकल्पों के बारे में चर्चा करेंगे। जहाँ तक भारत का सवाल है हमारे पास सिर्फ दो ही विकल्प हैं।

हम या तो हमेषा की भांति चीन की दादागिरी भरी विस्तारवादी नीति के सामने झुकते हुए चीन द्वारा कब्जा की हुई भूमि को छोड़ दें, भूल जायें की अक्साई चीन और शक्सगाम घाटी कभी हमारे देष का हिस्सा होती थी। भूल जायें की लद्दाख का एक बहुत बड़ा हिस्सा चीन और पाकिस्तान ने कब्जाया हुआ है। परंतु एक बार को अगर हम इस विकल्प को चुनते भी हैं तो क्या चीन अपनी विस्तारवादी सोच को बदल देगा ?

क्या चीन फिर हमारे दूसरे इलाकों पर अपनी कुदृष्टि नहीं डालेगा? ऐसा संभव नहीं है। चीन अपनी नापाक हरकतों से कभी बाज नहीं आयेगा। तो फिर यह बात साफ है कि यह हमारे लिए चुनने वाला विकल्प नहीं है।

दूसरा विकल्प हमारे पास यह है कि हम चीन की विस्तारवादी सोच और काल्पनिक ताकत के सामने न झुकें और चीन की आंख में आंख डालकर अपनी पुरजोर ताकत का इस्तेमाल करते हुए उसे जता दें कि 1950 के दषक में भारत ने पंचषील और हिन्दी चीनी भाई-भाई के तहत जो उससे दोस्ती का हाथ बढ़ाया था और जिसके बदले में 1962 में उसने हमारी पीठ में छुरा घोंपा था, आज का भारत दूसरा ही भारत है।

एक सक्षम त्वरित फैसले लेने वाले केन्द्रीय राजनैतिक नेतृत्व के साथ सुदृढ़ सैन्य शक्ति वाला भारत है। हम एक शांतिप्रिय देष हैं लेकिन पिछले कुछ वर्षाें में हमने शांति की परिभाषा को सिर्फ सहते रहने की भाषा से बदलकर, अगर मजबूर किया जाये तो शांति बनाये रखने के लिए, घुसकर मारने की परिभाषा में तब्दील कर दिया है।

पाकिस्तान ने इसको बहुत अच्छे से देखा है, वह इस भाषा को अच्छी तरह से जानता और समझता है। मई 2020 से चीन के विरूद्ध हमारी सरकार ने इसी विकल्प को चुना हुआ है जो कि दीर्घकालीन शांति और सुरक्षा के लिए सही भी है। वैसे भी राष्ट्रवादी सोच के दम पर सत्ता में आने वाली मौजूदा सरकार अगर इस नाजुक दौर में मजबूती से चीन के सामने नहीं खड़े रहती है तो उसका 2024 में सत्ता में आना प्रष्नीय हो जायेगा।

अब जबकि हमारे पास चीन को उसी की भाषा में जवाब देने का ही विकल्प है तो यह हम कैसे कर सकते हैं यह सोचने का विषय है? एक साधारण समय में दो देषों के बीच के आपसी संबंधों में वरियता अनुसार पहले राजनीतिक, कूटनीतिक, आर्थिक और अंत में सैन्य शक्ति के बारे में सोचा जाता है। परंतु आज के बदले हुए भारत चीन के संबंधों के परिवेष में, इस वरियता को बदल देने की तुरंत आवष्यकता है। अब हमें वरियताक्रम में सबसे पहले सैन्य, आर्थिक, कूटनीतिक और अंत में राजनीति की जरूरत है।

एक शक्तिषाली सैन्य शक्ति वाला देष ही आर्थिक प्रगति कर सकता है। यह जग जाहिर है। हमारे देष का सैनिक कठिन लड़ाई लड़ने में परिपक्व है। उसे आज के दौर के नवीनतम तकनीकि वाले हथियार और यंत्र मुहैया कराने की आवष्यकता है। आत्म निर्भर भारत एक बहुत उम्दा सोच है परंतु यहाँ यह समझने की बात है कि जो हथियार और यंत्र हमें आज चाहिए वह हमें आयात करने ही होंगे।

मध्यम और लम्बे समय में हमें निष्चित तौर पर आत्मनिर्भर भारत की योजना पर चलना चाहिए। हमारा प्राइवेट सेक्टर इसके लिए सक्षम है, तैयार है। अगर कोई समस्या है तो हमारे नौकरषाहों की सोच को बदलने की है, प्राइवेट सेक्टर को वास्तव में सुविधाएं प्रदान करने की है और कागजों से निकलकर जमीनी हकीकत पर आकर काम करने की है।

निकट भविष्य में हमें अपने देष की सीमाओं की रक्षा करने के लिए रक्षा बजट में बढ़ौतरी करनी ही होगी। कुछ समय के लिए यह हमारी आर्थिक प्रगति को जरूर रोकेगा परंतु यह भी सच है कि सुरक्षित सीमाएं होने पर हमारी आर्थिक प्रगति बहुत तेजी से बढ़ेगी। अगर सभी कारकों को मद्देनजर रखा जाये तो हमें कम से कम ढाई मोर्चों पर युद्ध लड़ने की आवष्यकता होगी।

पाकिस्तान और चीन हमें दो मोर्चों पर लड़ने के लिए मजबूर करेंगे ही परंतु इसके साथ-साथ हमें जम्मु और काष्मीर और देष के अन्य संवेदनषील इलाकों में आतंकवादियों और घर के जयचंदों से भी सावधान रहना होगा। इसके अलावा हमें चीन का नाड़ा पकड़ेे नेपाल की कम्युनिस्ट सरकार के इरादों के बारे में, बंगलादेष में आई.एस.आई. की बढ़ती हुई पैठ को और 1971 के युद्ध में श्रीलंका ने पाकिस्तान को अपने हवाई अड्डों पर इंधन भरने की सुविधा प्रदान की थी, को भी नहीं भूलना चाहिए।

हमें न केवल रक्षात्मक ताकत को बढ़ाना होगा बल्कि दुष्मन के घर में घुसकर सबक सिखाने के लिए आक्रामक ताकतों को ज्यादा बढ़ाना होगा। इसके लिए मैदानी इलाके की लड़ाई के लिए हमारे पास पर्याप्त मात्रा में स्ट्राइक कोर तो हैं परंतु पहाड़ी इलाकों की लड़ाई के लिए हमें हमारे देष की इतनी लम्बी पहाड़ी सीमाओं के लिए कम से कम दो माउंटेन स्ट्राइक कोर की आवष्यकता है।

130 करोड़ की हमारी आबादी दुनिया और खासतौर से चीन के लिए एक बहुत बड़ा बाजार है। इसके अलावा दुनिया में हमारे देष में सबसे अधिक युवा है। यह दोनों बातें हमारी बहुत बड़ी ताकत है। चीन को आर्थिक रूप से कमजोर करना संभव है। सिर्फ दो बार चीन निर्मित एप्स को बैन करने से ही चीन तिलमिला गया है। पूरा विष्व आज चीन से निकले कोविड के कारण एक महामारी की गिरफ्त में है और चीन को सबक सिखाना चाहता है।

हमें विष्व के अन्य देषों के साथ मिलकर चीन को आर्थिक झटका देना होगा। उसके लिए युद्ध की कीमत बहुत अधिक बढ़ानी होगी तभी हेकड़ीबाज चीन को धरातल नजर आयेगा। आर्थिक रूप से कमजोर चीन की युद्ध क्षमता भी कमजोर हो जायेगी।

दो देषों के संबंधों को सुधारने के लिए कूटनीतिक प्रयास हमेषा चलते रहना चाहिए। किसी भी समस्या का अंतिम समाधान मेज पर बैठकर ही होता है। इतिहास इसका गवाह है। यहाँ यह जरूरी है कि हमें अपने सभी साधनों और ताकतों को एकीकृत रूप में इस्तेमाल करना चाहिए। चाहे वह सूचनाओं का आदान-प्रदान हो या एक साथ मिलकर किसी समस्या का समाधान निकालने की बात हो, हमें एक दूसरे पर हावी होने की आदत को छोड़कर एक साथ मिलकर काम करने की जरूरत है। इस दिषा में काफी सराहनीय काम पिछले कुछ सालों में हुआ है परंतु अभी भी काफी गुंजाइष है। 

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