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भारत चीन की कहानी – कर्नल बी बी वत्स की जुबानी – 1

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भारत-चीन सीमा के  बीच जारी विवाद अब गहरे तनाव में तब्दील हो चुका है। लेकिन देश में मौजूद दूसरे मुद्दों की तरह लोगों का एक बड़ा तबका आधी अधूरी जानकारियों के आधार पर अपनी राय दूसरों पर थोपने की कोशिश कर रहा हैं। ऐसा करने वालों में देश के कई जिम्मेदार दल भी हैं जिनके कुछ नेता प्रधानमंत्री को घेरने के फेर में ऐसी बयानबाजी करते दिख रहे हैं जिससे यह आभास होता है कि मानों वह देश हित की चिंता करने के बजाए पड़ोसी देश चीन के हौसलों को बढ़ा रहे हैं। उसकी कठपुतली बन गए हैं।

इसी को मद्देनजर रखते हुए मुझे लगता है कि इस मुद्दे को आम आदमी को स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए ताकि वह इसे सही तरीके से समझ सके। इसलिए, मैंने इस विषय पर लेखों की एक श्रृंखला लिखने के बारे में सोचा जो मैं आपको 12 भागों में प्रस्तुत करने जा रहा हूं।

इस श्रृंखला के दौरान भारत चीन -सीमा  विवाद की पृष्ठभूमि, उसका इतिहास, मौजूदा हालात और आगे भारत और चीन के पास क्या विकल्प हैैं, इसकी भी गहराई से मीमांसा की जाएगी। विषय गंभीर और पेचादा किस्म का है, इसलिए, मैंने इसे 12 भागों में विभाजित किया है ताकि एक समग्र दृष्टिकोण सामने आ सके। इसकी पहली कड़ी भारत चीन सीमा विवाद पर 1962 से अब तक के हालात की कहानी अब मैं प्रस्तुत करता हूं।

चीन की विस्तारवादी सोच सत्तर साल पुरानी

India china border

चीन की दूसरे देशों में घुसने की आदत पुरानी है। चीन की सरहद 14 देशों से लगती है. लेकिन उसका सीमा विवाद 21 देशों के साथ बीते सत्तर सालों में साथ-साथ चलता आया है। इनमें सबसे बड़ा विवाद भारत, जापान, दक्षिण कोरिया, ताईवाान, रूस, मंगोलिया, तिब्बत , भूटान, नेपाल और हांगकांग के साथ चलता आया है। जहां भारत का सवाल है तो इतिहास में पहली बार चीन का इस तरह प्रतिकार भारतीय सेेना की तरफ से हो रहा है चीन के हौसले बढऩे की पृष्ठभूमि में झांकने की कोशिश करें तो कई कारक और कारण नजर आते हैं।

आजादी के तुरंत बाद से ही भारत के पाकिस्तान से संबंध खराब हो गए थे। खूनखराबा तो भारत -पाक विभाजन के साथ ही शुरू  हो गए थे। और चंद महीनों बाद ही  कश्मीर में घुसपैठ खत्म करने के लिए उससे युद्ध करना पड़ा। भारतीय सेना ने पूरी कामयाबी के साथ हमारा जो इलाका पीओके के  नाम से जाना जाता है, उसको पूरी तरह से मुक्त कराने की तरफ बढ़चुका  था लेकिन तभी भारत के राजनीतिक नेतृत्व ने कतिपय निहित स्वार्थों की खातिर भारतीय सेना के आक्रामक रूख पर लगाम लगा दी और संयुक्त राष्ट्र की अदालत में पाक के बजाए हम खुद चले गए। यूएन ने हस्तक्षेप करके युद्द रूकवा दिया और आज भी हम पीओकेे नाम के नासूर को झेल रहे हैं।

पाकिस्तान से खराब संबंधों के चलते भारत ने रूस के साथ ही चीन से भी संबंध अ‘छे रखने की पहल की। दोस्ती की इस इकतरफा पहल के चलते ही ताईवान से अलग होकर बने चीन को भारत ने सबसे पहले कम्युनिस्ट देश के बतौर मान्यता दी। यही नहीं भारत ने संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद की स्थाई सीट के आफर को ठुकराते हुए चीन का नाम आगे किया।

लेकिन विडम्बना देखिए कि आज वही चीन बरसों से भारत को सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता मिलने से रोकने के लिए अपने वीटो का इस्तेमाल कर रहा है। वह पाकिस्तान का मददगार बनकर भारत के प्रयासों को अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर नाकाम करने की हरसंभव कोशिश में लगा रहता है। भारत को शुरू से ही दो चीन वाली नीति पर चलना था। लेकिन चीन की अंधभक्ति में हमने ताईवान से भी संबंध वि‘छेद कर लिए थे।

भारतीय नेतृत्व और उसके कूटनीतिक सलाहकारों ने हमारी स्थिति न खुदा मिला न विसाल सनम वाली कर दी। जिस तरह बीते पांच सालों में नरेंद्र मोदी ने शी जिनपिंंग के साथ डेढ़ दर्जन बार मुलाकात करके भारत-चीन संबंध सुधारने की कोशिश की ,कमोबेश वैसे ही प्रयास हमारे प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने माओ के साथ पंचशील के सिद्धांंत के तहत हिंदी चीनी भाई भाई का नारा बुलंंद किया था। लेकिन नतीजा क्या हुआ? धोखा और सिर्फ धोखा।

चीन ने  भारत से एक तरफ दोस्ती गांठने का ढोंग किया और दूसरी तरफ उसने भारत और चीनी सीमा के बीच बसे शांतिप्रिय देश तिब्बत को अपना इलाका बताते हुए हड़प लिया। भारत में घुसपैठ की मंशा को अंजाम देने वाला चीन का यह पहला कदम था। इसके साथ ही भारत और चीन के बीच के तिब्बत का बफर स्टेट खत्म हो गया और अरूणाचल, सिक्किम से लेकर हिमाचल और लद्दाख की सीमा तक चीनी फौज की सीधी तैनाती हो गई।

दुर्भाग्य की बात तो यह है कि अपने सिर पर सीधा खतरे की अनदेखी करते हुए भारतीय नीतिकारों ने तिब्बत को चीन की हिस्सा मानने में सबसे पहले पहल करके आत्मघाती कदम उठा लिया। लेकिन तीन साल  के भीतर ही भारत सरकार ने तिब्बत से निष्कासित दलाईलामा को भारत में शरण देकर चीन की दुश्मनी मोल ले ली।

कूटनीतिक फैसलों में ऐसे विरााधाभासी फैसले ने चीन को यह मौका दिया कि वह भारतीय भूमि पर घुसपैठ करके अपना कब्जा जमाए। 1962 में हुआ भी ऐसा ही। भारत सरकार हिंदी चीनी भाई-भाई के मुगालते में डूबी रही और भारतीय सेना को आने वालेे युद्ध के लिए तैयाार नहीं किया, जिसके चलते चीन ने भारत के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया। अरूणाचल प्रदेश के बड़े भू भाग के साथ ही पूर्वी लद्दाख के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया और वह उस पर आज भी काबिज है। भारत ने चीन के मामले में चौथी गल्ती बिना साजो सामान के ऊंचे बर्फीेले पहाड़ी क्षेत्रों में सेना को भेजा।

आश्चर्य की बात तो यह रही कि हमारे रणनीतिकार युद्ध के वक्त भी लखनवी नजाकत दिखाते हुए इस चिंता में डूबे थे कि कहीं चीन और नाराज न हो जाए। इसी के चलते भारत के थल सैनिकों को वायुसेना के जिस सपोर्ट की जरूरत थी वह भारत सरकार ने प्रदान नहीं की।

– कर्नल डाॅ. भारत भूषण वत्स (से.नि.)

लेखक के बारे में

कर्नल डाॅ. भारत भूषण वत्स ने बिग्रेड आफ द गार्डस की सेकेंड बटालियन(फस्र्ट ग्रेनेडियर) को आपरेशन पराक्रम के दौरान कमांड की है। उन्होने अपनी सेवाओं के दौरान पाकिस्तान, बर्मा, चीन और नेपाल की सरहद पर करीब 25 साल सेना को सेवाएं दी हैं तथा 1999 में कारगिरल युद्ध के दौरान युद्ध क्षेत्र में रहकर पाकिस्तानी फौज से लोहा लिया है।

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