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भारत और चीन – मौजूद स्थिति का आंकलन – कर्नल डाॅ. भारत भूषण वत्स (से.नि.)

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13 दिसम्बर 2001 को लष्कर-ए-तोयबा और जैष-ए-मोहम्मद आतंकवादी संगठनों ने जब लोकतन्त्र की नींव, हमारी संसद पर आक्रमण किया तो प्रधानमंत्री स्व. श्री अटल बिहारी बाजपेयी ने तुरंत फैसला लेते हुए भारतीय फौजों को सीमा पर तैनाती का आदेष दे दिया। भारतीय सेना ने भी त्वरित गति से लामबंदी करके पाकिस्तानी सेना को भौचक्का कर दिया। पाकिस्तानी सेना अपनी अफगानिस्तान से लगी पष्चिमी सीमा पर तैनात फौजों को भारत से लगी पूर्वी सीमा पर षिफ्ट नहीं कर पाई और जब हमारी सेनाएं सीमा पर पहुंची तो पाकिस्तान के बहुत ही कम सैनिक वहाँ पर तैनात थे।

यह एक सुनहरा मौका था पाकिस्तान को अच्छा सबक सिखाने का परंतु शायद अन्तर्राष्ट्रीय दबाव के सम्मुख दिल्ली की केन्द्रीय सरकार सीमा पार करने का आदेष नहीं दे पाई। समझ में नहीं आता कि मई 1998 में, 1974 के बाद दूसरी बार, राजस्थान के पोखरण क्षेत्र में लगातार पांच परमाणु बमों का परीक्षण करके और उसके पश्चात् अमेरिका और जापान जैसे देषों के प्रतिबंधों को सहजता से झेलने वाली बाजपेयी सरकार ने ऐसा क्यों किया? क्या केन्द्रीय नेतृत्व और उनके सलाहकारों ने संभावित  अन्तर्राष्ट्रीय दबाव का आंकलन नहीं किया था? और अगर इस दबाव को सहन करने की क्षमता नहीं थी तो फिर लगभग नौ महीने भारतीय सेना को सीमा पर बैठाकर रखने का भी कोई औचित्य नहीं था। आक्रमण के लिए 48 घंटे नोटिस पर एकदम तैयार सैनिक को जब अंतिम आदेष नहीं मिलता है तो उसके मनोबल पर क्या असर पड़ता है यह एक सैनिक ही समझ सकता है।

कमोबेश वैसी ही स्थिति आज चीन के साथ बन रही है। जग जाहिर है कि चीन वार्तालापों को लम्बा खींचकर अपने स्वार्थों को पूरा करने में माहिर है। आज पूर्वी लद्दाख में हम एक ताकतवर स्थिति में हैं। 29-30 अगस्त 2020 की रात को पेंगोंगसो झील के दक्षिणी क्षेत्रों को अपने कब्जे में करके हमने चुषूल इलाके को गहराई देकर स्थिरता प्रदान करने, स्पेंगगुर गैप के दोनों किनारों पर सेनाएं तैनात करके चीन के सम्भावित आक्रमण को रोकने और सबसे अधिक चीन के स्थाई मोल्डो केम्प पर लगातार निगरानी करने की क्षमता हासिल की है।

पेंगोंग्सो झील के उत्तरी किनारे पर फिंगर 4 पर चीनी सैनिक कब्जा करके बैठे हैं मगर हमने फिंगर 4 और आसपास के उत्तरी और ऊपरी इलाके में अपने सैनिकों की तैनाती करके चीन की इस इलाके की योजना को भी विफल कर दिया है। ज्ञात रहे कि फिंगर 4 पर बैठा सैनिक फिंगर 1 से लेकर फिंगर 8 तक निगरानी रख सकता है। एक बार हमने इन इलाकों को खाली कर दिया तो क्या गारंटी है कि धोखेबाज चीन फिर दोबारा इन सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इलाकों पर कब्जा नहीं कर लेगा? चीन के अधिकारिक समाचार पत्र ग्लोबल टाइम्स ने अभी से ही भारत को आक्रमणकारी घोषित कर दिया है जो कि चीन की बदनियत को दर्षाता है। हमें इतिहास से बहुत कुछ सीखना होगा।

चीन कोविड-19 के बाद बहुत मुष्किल स्थिति में फंसा हुआ है। पूरा विष्व उसके खिलाफ लामबन्द हो चुका है। उसकी आर्थिक स्थिति डगमगा रही है। आंतरिक तौर पर चीन में शी जिन पिंग के नेतृत्व को चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं। अगले साल कम्युनिस्ट पार्टी की महत्वपूर्ण मीटिंग में शी जिन पिंग द्वारा किये गए बड़े-बड़े वादों का आंकलन किया जायेगा। चीन इन परिस्थितियों से निकल कर अपनी साख बचाना चाह रहा है। परंतु हमारी क्या मजबूरी है कि जिस देष ने हमारे लगभग 70 हजार वर्ग किमी इलाके पर कब्जा किया हुआ है उसे हम मजबूत स्थिति में होने के बावजूद राहत की सांस लेने दें? चीन पर लिए गये कुछ आर्थिक फैसलों का नतीजा सामने आने लगा है। इस दिवाली पर चीन का दिवाला निकल चुका है। जरूरत है और ज्यादा कड़े फैसले लेकर चीन की अर्थव्यवस्था पर आर्थिक दबाव डालें ताकि वह मजबूरन एक अच्छे पड़ौसी देष की तरह व्यवहार करना शुरू कर दे।

पूर्वी लद्दाख में चीन के उद्देष्य स्पष्ट है। वह पैंगोंगसो और स्पैंगगुर झील के इलाके में चुषूल क्षेत्र पर हावी होना चाहता है, गलवान क्षेत्र में हमारे द्वारा तीव्र गति से बनायी जा रही दुर्बुक-डीबीओ सड़क को डोमिनेट करना चाहता है और दैपसोंग के पठारी इलाके पर हावी होकर सियाचीन को पूर्व दिषा से धमकाने के अलावा काषगर से ल्हासा को जोड़ने वाली पष्चिमी हाइवे जी-219 को गहराई प्रदान करना चाहता है। चीन किसी भी हालत में पी.ओ.के. को भारत के हाथों में नहीं जाने दे सकता क्योंकि इससे उसकी महत्वकांक्षी सी-पैक परियोजना खटाई में पड़ सकती है। इन्हीं उद्देष्यों की पूर्ति के लिए उसने पैंगोंगसो में फिंगर 4 और देपसोंग डी.बी.ओ. इलाके में पी.पी. 10 और 11 पर घुसपैठ की हुई है और गलवान घाटी में पी.पी. 14 को जून माह में कब्जा करने की हिमाकत की थी। चीन की हर हरकत पर प्रभावी तरीके से नजर रखने के लिए हमें नवीनतम निगरानी रखने वाले साधनों की सख्त और तुरंत आवष्यकता है।

पहली बार जब हम एक ताकतवर स्थिति में आये हैं और लगभग पूरा विष्व हमारे साथ खड़ा है तो फिर क्यों हम चीन की बातों में आकर इस स्थिति को कमजोर करना चाहते हैं? जरूरत तो चीन की दुखती रगों को दबाने का है चाहे वह दो चाइना पाॅलिसी को मुखर रूप से कहने का हो, तिब्बत की आजादी के लिए आवाज उठाने का हो, होंगकोंग में हो रहे अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाने का हो, दक्षिणी चीन सागर पर चीन द्वारा कब्जा की जाने की कोषिषों का हो, उइगर मुसलमानों पर हो रहे अमानवीय अत्याचारों का हो या फिर विष्व के गरीब देषों को लोन के जाल में फंसाकर अपनी मनमानी करने के बारे में हो।

1962 के बाद पहली बार चीन की आंख में आंख डालकर उसको उसी की भाषा में उसकी औकात बताई जा रही है। भारतीय सेना ने पूरी सर्दियों के मौसम में इन दुर्गम इलाकों में रहने के लिए रसद जमा की हुई है। पूरा विष्व जानता है कि भारतीय सैनिक उच्च तुंगता वाले इन दुर्गम इलाकों में लड़ाई लड़ने के लिए सबसे अधिक अनुभवी और प्रषिक्षित है जबकि पी.एल.ए. में कुछ सालों के लिए जबरदस्ती भरती किए गये सैनिक, सैन्य क्षमता में हमारे सैनिकों के सामने बहुत कमजोर है। यहाँ यह भी जानना महत्वपूर्ण है कि चीन ने भारत से लगे सीमा क्षेत्रों को रोड़, रेल और हवाई अड्डों के जाल से जोड़ दिया है जबकि राजनीतिक कारणोंवष हमारा सीमा पर बुनियादी ढांचे का विकास चीन के मुकाबले बहुत कम है। इसलिए जरूरत पड़ने पर चीन हमारे मुकाबले ज्यादा तेज गति से अपना लाॅजिस्टीक बिल्डअप कर सकता है।

ऐसी परिस्थितियों में बिना किसी स्थायी लम्बे सामरिक लाभ के हमें इन महत्वपूर्ण इलाकों को छोड़ना कहां तक की समझदारी होगी? 1965 के युद्ध के बाद बड़ी मुष्किल से जीते हाजी पीर दर्रे को वापिस करने के कारण दुष्मन ने हमें कारगिल जैसी नापाक हरकत से नवाजा था। कहीं ऐसा न हो कि एक बार फिर युद्ध के मैदान में जीती हमारी सेना बातचीत की मेज पर हार जाये। कहीं इतिहास दोबारा तो नहीं दोहराया जायेगा?

पीछे हटने की कार्यवाही हमारी शर्तों और समय अनुसार होनी चाहिए। अब जबकि सर्दियों में हमारी सेना वहाँ पर तैनाती के लिए पूरी तरह से सक्षम हैं तो अच्छा होगा कि हम पीछे हटने की कार्यवाही भी सर्दियों के बाद ही शुरू करें।

   – कर्नल डाॅ. बी.बी. वत्स (रि.)

2 Comments:

  1. Dr Yogeshkumar Savjibhai Patel

    Good article.
    Very informative and motivative.

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