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आर्मेनिया अजरबैजान युद्ध और भारत- कर्नल डाॅ. भारत भूषण वत्स (से.नि.)

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आर्मेनिया अजरबैजान युद्ध और भारत

भूतपूर्व सोवियत संघ के विघटन के बाद बने 15 देषों में से अजरबैजान और आर्मेनिया भी हैं। सेंट्रल एषिया के दक्षिण काकेषस पर्वत के इलाके में स्थित अजरबैजान आर्मेनिया से तकरीबन तीन गुना बड़ा है। दोनों देषों के मध्य डेढ लाख की आबादी और सिर्फ 4400 वर्ग किमी क्षेत्रफल का लैण्ड लाॅक्ड इलाका नार्गोनो काराबाख हमारे हरियाणा प्रांत के बराबर है और दोनों देषों के बीच संघर्ष का कारण बना हुआ है।

Armenia Azerbaijan War 2

Armenia-Azerbaijan

नार्गोनो काराबाख के कारण अजरबैजान दो अलग-अलग भागों में बंट गया है जिसका आपस में जमीनी रास्ते से कोई सम्पर्क नहीं है। नार्गोनो काराबाख की ईसाई धर्म को मानने वाली लगभग 95 प्रतिषत आबादी आर्मेनियाई मूल की है जबकि अजरबैजान एक षिया मुस्लिम बहुल राष्ट्र है। हालांकि सोवियत संघ ने विघटन से पहले नार्गोनो काराबाख को अजरबैजान को सौंप दिया था परंतु दोनों देष 1988 से 1992 तक लगभग चार साल उसके स्वामित्व को लेकर खूनी जंग लड़ चुके हैं जिसे रूस ने मध्यस्थता करके रूकवाया और इसी कारण 2016 तक दोनों देषों के मध्य छिटपुट घटनाओं के अलावा शांति बनी रही।

1980 के दषक में नार्गोनो काराबाख की संसद ने आर्मेनिया के साथ रहने के लिए वोटिंग की जिसे अजरबैजान ने नहीं माना और फलस्वरूप लगभग 30 हजार लोगों की जाने गईं और बहुत से लोगों को पलायन करना पड़ा। 1994 से ही नार्गोनो काराबाख पर आर्मेनिया का कब्जा है परंतु अजरबैजान और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय इस क्षेत्र को अजरबैजान का ही हिस्सा मानते हैं। 2016 में एक बार फिर चार दिन चले भयानक युद्ध में लगभग 200 जाने गईं थीं। अब चार साल बाद एक बार फिर इस इलाके में युद्ध की आग धधक गई है।

टर्की और अजरबैजान, दोनों मुस्लिम राष्ट्रों के मध्य आर्मेनिया है। टर्की का तानाषाह राष्ट्रपति रजब तैयब इरदुगान अरब देषों से अलग एक मुस्लिम ब्लाॅक का सृजन करके उसका सरगना बनना चाहता है। पाकिस्तान और मलेषिया उसका साथ दे रहे हैं। इसी कारण पिछले दिनों में पाकिस्तान ने सउदी अरब से अपने सम्बंध खराब कर लिए हैं जिसके फलस्वरूप सउदी अरब ने पाकिस्तान को लोन वापिस करने का अल्टीमेटम दिया हुआ है।

Armenia Azerbaijan War 3

Armenia Azerbaijan

सन् 2010 में तुर्की और अजरबैजान के मध्य 10 सालों के लिए हुए रक्षा समझौते अनुसार अगर दोनों राष्ट्रों पर कोई तीसरा देष आक्रमण करता है तो वह एक दूसरे की मदद करेंगे। इसी कारण टर्की अजरबैजान के साथ युद्ध में शामिल है। यह भी देखना रोचक होगा कि सनकी इरदुगान की महत्वकांक्षाओं का टर्की की पहले से ही चरमराई हुई आर्थिक स्थिति कब तक साथ देगी। इरान और अजरबैजान दोनों षिया बहुल मुस्लिम राष्ट्र हैॅं और अजरबैजान का दक्षिणी इलाका इरान की सीमा से लगता है। स्वाभाविक तौर पर इरान का झुकाव अजरबैजान की तरफ है।

रूस अजरबैजान और आर्मेनिया दोनों को हथियारों की आपूर्ति करता है परंतु ईसाई बहुल आर्मेनिया के साथ रूस का रक्षा समझौता होने के कारण उसे आर्मेनिया पर आक्रमण की स्थिति में आर्मेनिया का साथ देना होगा। इसलिए रूस खुले तौर पर ऐसा ऐलान भी कर चुका है। अगर यह युद्ध नार्गोनो काराबाख के सीमित इलाके से निकल कर एक पूर्ण युद्ध में तब्दील हो जाता है तो विष्व के कई बड़े राष्ट्रों जैसे अमेरिका, फ्रांस, रूस और ब्रिटेन को इस युद्ध में भाग लेना पड़ सकता है। यह युद्ध धर्म के आधार पर मुस्लिम राष्ट्रों बनाम ईसाई राष्ट्रों के बीच युद्ध का भी रूप ले सकता है जो कि एक भयावह स्थिति होगी।

पाकिस्तान टर्की की उंगली पकड़कर मुस्लिम राष्ट्रों का सरगना बनना चाहता है ताकि वह दक्षिण एषिया में भारत का मुकाबला कर सके। इसीलिए पाकिस्तान 4000 किमी दूर जाकर अपने सैनिकों को आर्मेनिया के खिलाफ उतार रहा है। गौरतलब है कि पाकिस्तान आर्मेनिया को एक स्वतन्त्र राष्ट्र ही नहीं मानता और उसने उसे मान्यता भी नहीं दी है। टर्की और पाकिस्तान जैसे कंगाल हो चुके देषों का मुस्लिम राष्ट्रों का सरगना बनने का ख्वाब सिर्फ मुंगेरी लाल के हसीन सपनों से ज्यादा कुछ नहीं हो सकता है।

भारत अभी तक इस युद्ध में तथस्टता की नीति अपनाये हुए है हालांकि आर्मेनिया भारत से हथियार खरीदता है और उसने हमेषा से संयुक्त राष्ट्र जैसे मंच पर कष्मीर आदि मुद्दों पर भारत का साथ दिया है जबकि अजरबैजान हमेषा पाकिस्तान के साथ दिखाई दिया है। सन् 2000 में भारत रूस और ईरान ने मिलकर अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण ट्रांसपोर्ट कोरिडोर का गठन किया था जिसका मुख्य उद्देष्य सेन्ट्रल एषिया और यूरोप के देषों में माल लाने और ले जाने के लिए कम समय और लागत के लिए एक समुद्री, रेल और रोड़ का नेटवर्क बनाना है।

धीमी गति से चल रहे इस महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट पर भी इस युद्ध का असर पड़ सकता है क्योंकि यह नेटवर्क अजरबैजान से होकर गुजरता है तथा आर्मेनिया और अजरबैजान दोनों इस प्रोजेक्ट में शामिल हैं। अजरबैजान में पेट्रोलियम पदार्थ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं और इसीलिए इन पेट्रोलियम पदार्थों की अहमियत को समझते हुए टर्की अजरबैजान को अपनी गिरफ्त में लेना चाहता है। ऐसा होने की स्थिति में भारत को नुकसान हो सकता है क्योंकि भारत की ओ.एन.जी.सी. की अन्तर्राष्ट्रीय इकाई अजरबैजान में पेट्रोलियम पदार्थों के खनन का कार्य कर रही है।

– कर्नल डाॅ. भारत भूषण वत्स (से.नि.)

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