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भारत चीन की कहानी – कर्नल बी बी वत्स की जुबानी – 5

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भारत और चीन के लिए लद्दाख का सामरिक महत्व

2018 में भारत का एक केन्द्र शासित प्रदेष बने लद्दाख के दक्षिण में जंसकार पर्वतमाला और उत्तर में काराकोरम पर्वतमाला है और बहुत पुराने समय से ही सिल्क रूट के लिए प्रसिद्ध रहा है। भारत और चीन दोनों के लिए लद्दाख का बहुत बड़ा सामरिक महत्व है। भौगोलिक दृष्टि से भारत के सबसे बड़े केन्द्र शासित प्रदेश लद्दाख का हमारे पास कुल इलाका 59 हजार वर्ग किलोमीटर है जबकि गिलगिट बाल्टिस्तान का 73 हजार वर्ग किलोमीटर पाकिस्तान ने पी.ओ.के. में हथियाया हुआ है। चीन ने अक्साई चीन इलाके का करीब 37 हजार वर्ग किलोमीटर 1962 में हथिया लिया जबकि 5 हजार वर्ग किलोमीटर का शक्सगाम घाटी का इलाका पाकिस्तान ने चीन को दे दिया है।

Ladakh

लद्दाख के उत्तर-पूर्व में सियाचीन ग्लेषियर विष्व का सबसे ऊँचा युद्ध स्थल है जहाँ हमारी और पाकिस्तान की सेनाएं एक दूसरे के आमने-सामने तैनात हैं। 1984 से ही पाकिस्तान ने अनेक बार सियाचीन ग्लेषियर पर कब्जा करने की कोषिष की परंतु हर बार हमारी सेनाओं ने उसकी नापाक कोषिषों को नाकाम कर दिया। सियाचीन, चीन और पी.ओ.के. इलाके में एक कील की माफिक घुसा हुआ है और दोनों को अलग करता है। इसी कारण सियाचीन पाकिस्तान और चीन को एक साथ हमारे खिलाफ नुब्रा घाटी और लेह की तरफ संयुक्त अभियान करने के लिए सामरिक दृष्टि से रोकता है। ये तो भला हो जनरल जे.जे. सिंह, हमारे सेनाध्यक्ष का, जिन्होंने दिल्ली में बैठी उस समय की सरकार के, सियाचीन को पाकिस्तान को तोहफे के रूप में सौंपने के मंसूबों को पूरा नहीं होने दिया वरना आज हमारे लिए स्थिति काफी विकट हो जाती।

चीन के लिए लद्दाख की महत्वता हमारे से ज्यादा है। चीन ने तिब्बत आॅटोनोमस रीजन को अपने दक्षिणी प्रांत झिंनजियाग से जोड़ने के लिए ल्हासा से कासगर तक जी-219 सड़क का निर्माण किया है जो चीन द्वारा हथियाए हुए हमारे अक्साई चीन इलाके से गुजरती है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने जबसे पी.ओ.के. और अक्साई चीन वापस लेने की हुंकार भरी है तब से ही चीन असहज हो गया है। उसे अपनी विस्तारवादी नीतियों और आर्थिक महत्वकांक्षाओं पर पानी फिरता नजर आ रहा है।

चीन को अपनी आर्थिक महत्वकांक्षाओं को पूरा करने के लिए कच्चा माल अविकसित देषों से सस्ता लेकर उसे महंगे दामों पर यूरोप अमेरिका के विकसित धनवान देषों को बेचना है। इसके लिए समुद्री रास्ता सबसे सस्ता और टिकाऊ होता है परंतु चीन की मुष्किल यह है कि हिंद महासागर और अरब सागर में आने के लिए उसको एक लम्बा समुद्री रास्ता तय करना पड़ता है जो उसे आर्थिक तौर पर मुफिद नहीं होता है और उसके आयात-निर्यात पर गहरा नकारात्मक असर डालता है। इस समस्या को दूर करने के लिए उसने सीपैक यानी चाइना पाकिस्तान इकोनोमिक कोरिडोर योजना प्लान की जो कि उसकी वन बेल्ट वन रोड़ यानी दुनिया के अधिकतर देषों को एक रोड़ से जोड़ने की महत्वकांक्षी योजना का हिस्सा है।

सीपैक बुनियादी ढांचों जैसे रोड़, दूरसंचार और ऊर्जा इत्यादि परियोजनाओं का संग्रह है जो चीन के दक्षिणी प्रांत झिंगजियांग के खुंजराब से शुरू होकर गिलगित बाल्टिस्तान से गुजरते हुए पाकिस्तान के करांची के नजदीक ग्वादर बंदरगाह तक जाती है। इस योजना में चीन अभी तक 87 अरब डाॅलर खर्च कर चुका है। पी.ओ.के. भारत का हिस्सा है यह चीन भलीभांति जानता है और जिस दिन से हमने पी.ओ.के. और अक्साई चीन को वापस लेने का इरादा जाहिर किया है तब से पाकिस्तान के साथ-साथ चीन की भी नींद उड़ी हुई है। इसी सीपैक के जरिए चीन ने पाकिस्तान को पूरे तरीके से आर्थिक रूप में अपने पर आधारित करके अपनी एक उपनिवेष बस्ती के रूप में तबदील कर लिया है।

लबोलबाब यह है कि अगर हम पी.ओ.के. वापस ले लेते हैं तो पी.ओ.के. के गिलगिट बाल्टिस्तान से गुजरने वाली सीपैक परियोजना बिना हमारी अनुमति के नहीं चल पायेगी और चीन का छोटे जमीनी रास्ते से हिन्द महासागर और अरब सागर में पहुँचने का मंसूबा खतरे में पड़ जायेगा। चीन यह जानता है, समझता है और इसलिए परेषान होकर भारत की शक्ति को परखने की कोषिष कर रहा है। पर विडम्बना यह है कि उसकी सोच से अलग उसे एक अलग ही भारत का सामना करना पड़ रहा है। एक परिपक्व राजनीतिक नेतृत्व और सषक्त सुदृढ़ सैन्य शक्ति वाला भारत, आंख में आंख डालकर देखने वाला भारत। डोकलाम गलवान और ब्लैक टाॅप तो सिर्फ एक बानगी है।

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