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भारत चीन की कहानी – कर्नल बी बी वत्स की जुबानी – 3

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हम सहते रहे और वो हमें चमकाते रहे।

भारत को अपनी कूटनीतिक अक्षम्य भूलों का सिला 1962 में चीन के हाथों लड़े गए आधे अधूरे युद्ध में पराजय से मिला और इससे भी शर्मनाक बात तो यह रही कि श्रीलंका जैैसे अदने से देश ने चीन के साथ हमारी मध्यस्थता कराई।

भारत के यह मानने में कई साल गए कि चीन कभी भी हमारा स्वाभाविक मित्र  नहीं बन सकता। वह 1955 से लगातार अपने विस्तारवादी नीतियों पर खुले आम चल रहा था और हम उसको खुश करने के जतन में लगे रहे और उसकी हर नाजायज बात को मानते रहे। 1955 में चीन ने अपने आधिकारिक नक्शे में भारत के उत्तरी भाग को शामिल दिखाकर हमेें खुली चुनौती दी।

1962 india china war 1

1959 में चाऊ एन लाई ने पहली बार खुले तौर पर भारत के लद्दाख और नेफा इलाके (मौजूदा अरूणाल प्रदेश)  के 40 हजार वर्ग मील इलाके को अपना बता दिया और मेकमोहन लाइन को यह कहते नकार दिया कि 1842 में इंग्लैंड और ब्रिटिश इंडिया के बीच हुई शांति संधि का वह हिस्सा नहीं था। चीन यहीं तक नहीं रूका और उसने सिक्किम और भूटान के लगभग 50 हजार वर्ग किलोमीटर इलाके पर अपना दावा ठोंक दिया।

मार्च 1963 में पाकिस्तान ने चीन को पाक अधिकृत कश्मीर के चीन के उंईगर मुस्लिम बहुत प्रांत जिनजियांग से सटे लगभग 5हजार 80 वर्ग किलोमीटर चीन को दे दिया। लेकिन हम चीन के साथ शांति समझौतों की ही बात करते रहे।

1965 में भारत ने पाकिस्तान को तो हरा दिया। लेकिन चीन ने इस मुगालते में कि भारत कमजोर हो गया है, उसने सितंबर-अक्टूबर 1967  में सिक्किम के नाथूला और चोला इलाके में बार्डर फैंसिंग के मुद्दे पर हमारी सेेना पर अचानक फायरिंग करके इन अहम  इलाकों को कब्जा करने की कोशिश की। लेकिन भारतीय सेना ने इसका मुंहतोड़ दिया अपनी एक-एक इंच जमीन भी उसे नहीं हथियाने दी। इस मिनी युद्ध में भारत के 88 जवान शहीद हुए लेकिन चीन ने भी आधिकारिक तौर पर अपने 340 सैनिकों के मारे जाने की बात कबूली।

1962 india china war 2

इसी बीच 1975 में सिक्किम का भारत के राज्य के रूप में विलय हो गया। तब तक वह भूटान की तरह स्वतंत्र देश था। चीन ने इस पर भी आपत्ति ली थी, क्योंंकि वह भी सिक्किम पर नजरें गड़ाए बैठा था। वह सिक्किम के जरिए उत्तर पूर्वी भारत के सातों राज्यों को भारत से अलग करके हथियाना चाहता था। लेकिन इंदिरा गांधी की दृढ़ इच्छाशक्ति के चलते वह कुछ नहीं कर सका।

इस बीच भारत ने  1986 में भारत ने अरूणाचल प्रदेश को आधिकारिक राज्य दर्जा देने पर चीन ने कड़ी आपत्ति जाहिर की थी, लेकिन तब भी भारत में मजबूत बहुमत वाली राजीव गांधी सरकार के सामने वह ज्यादा कुछ नहीं कर सका।

1986 में ही चीन के अरूणाचल प्रदेश के सौंमद्रांग छू घाटी पर अचानक घुसपैठ करके कब्जा कर लिया, लेकिन भारतीय सेना  ने त्वरित कार्रवाई करते हुए अपनी पूरी एक बिग्रेड को रातोंरात हेलीकाप्टर से घाटी के चारों ओर की पहाडिय़ों पर उतारकर मोर्चा साध लिया। अचानक इस पलटवार से हैरान चीन को तब भी कदम पीछे खींचना पड़े और सेना ने सौमद्रांग घाटी के चीनी कब्जे से मुक्त करा लिया।

भारत सरकार और भारतीय सेना के इन तेवरों  के आगे चीन लंबे समय तक ठंडा पड़ा रहा। यहां तक कि 1999 मेें जब पाकिस्तान ने कारगिल में घुसपैठ की कोशिश की तो भारतीय सेना क आपरेशन के दौरान चीन ने लद्दाख में कोई हरकत नहीं की और अंतर्राष्ट्रीय दवाब के सामने तटस्थ बना रहा। (जारी…)

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