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अफगानिस्तान मे उथल पुथल का सामरिक असर

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अफगानिस्तान और भारत एक दूसरे के पड़ोस में स्थित दक्षिण एशियाई क्षेत्रिय सहयोग संगठन (दक्षेस) के दो सदस्य हैं। महाभारत काल में अफगानिस्तान के गांधार (वर्तमान में कंधार) की राजकुमारी का विवाह हस्तिनापुर (वर्तमान दिल्ली) के राजा धृतराष्ट्र से हुआ था।

21वीं सदी में तालिबान के पतन के बाद से भारत ने अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में रचनात्मक भूमिका निभाई है। 4 अक्टूबर 2011 को दोनो देशों के मध्य हुई बैठक में सामरिक मामले, खनिज संपदा की साझेदारी और तेल और गैस की खोज पर साझेदारी संबंधी तीन महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए। दोनो एक दूसरे का हमेशा अंतरराष्ट्रीय मंच पर समर्थन करते रहे हैं।

तालिबान पश्तो भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ होता है , ऐसे छात्र जो इस्लामिक विचारधारा पर यकीन करते हैं। तालिबान इस्लामिक कट्टपंथी राजनीतिक आंदोलन हैं। जिस तरीके से तालिबान ने कुछ हफ्तों में ही इतनी तेजी से लगभग पूरे अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया है उससे पूरा विश्व भौचक्का है।

अफगानिस्तान की दो पीढ़ियों ने बाहरी ताकतों की त्रासदी को झेला है। रूस के बाद अमेरिका और बीच में 1996 से 2001 तक लगभग 5 साल तालिबान की बर्बर सरकार की यादें अधिकतर अफगानीयों, खासतौर से औरतों के, जेहन में अभी भी ताजा हैं। इसी रूढ़ीवाद कट्टरपन सोच के कारण तालिबान दुनिया के देशों में आज तक अपनी पहचान नहीं बना पाया है।

अफगानिस्तान के पूर्व में पाकिस्तान और भारत है, तुर्कमेनिस्तान और उज्बेकिस्तान पश्चिम में, तजाकिस्तान और चीन उत्तर में जबकि ईरान और बाकी पश्चिम एशिया के देश इसके दक्षिण में हैं। अफगानिस्तान अपनी भू सामरिक स्थिति के कारण दक्षिण और पश्चिम एशिया को सेंट्रल एशिया से जोड़ता है। दक्षिण एशिया के देशों की आबादी ज्यादा होने के कारण उनकी उर्जा की जरूरतें ज्यादा है।

इसके विपरीत सेंट्रल एशिया में ऊर्जा के बहुत बड़े भंडार हैं और आबादी कम है। इस प्रकार दक्षिण एशिया का जुड़ाव सेंट्रल एशिया से होने पर दोनों इलाकों के लोगों के लिए लाभदायक होगा ।अफगानिस्तान के लिए तो विशेष तौर पर क्योंकि पूरा व्यापार अफगानिस्तान के रास्ते से ही संभव होगा। अफगानिस्तान में मौजूद खनिज संपदाओं का भंडार और भूतपूर्व यूएसएसआर से अलग हुए सेंट्रल स्टेट्स में दुनिया के दूसरे बड़े तेल के भंडार पर यूरोपीय देशों और अमेरिका की नजर अफगानिस्तान की अहमियत को और अधिक बढ़ा देती है।

अफगानिस्तान में खर्चीले और लंबे समय तक जारी सैन्य हस्तक्षेप और स्पष्ट विफलता के बाद अमेरिका को अब अफगानिस्तान में अपना कोई हित नज़र नहीं आ रहा है। अमेरिका अपने विफल युद्धों में ही संलग्न बने रहने के बजाय अब चीन के साथ उभरती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्द्धा के लिये स्वयं को तैयार कर रहा है । क्या अमेरिका का इस तेजी से अफगानिस्तान से चले जाना एक बड़ी स्ट्रेटजी का हिस्सा है?

Afghanistan and America 2

अमेरिका भले ही अफगान सरकार का साथ छोड़ दे किंतु भारत यह जोखिम नहीं उठा सकता।

क्या अमेरिका चीन और पाकिस्तान को अफगानिस्तान की ना जीत सकने वाली स्थिति में फंसाना चाहता है ? यह कोई संयोग नहीं हो सकता कि अमेरिका के अफगानिस्तान से बाहर निकलते ही उसकी विदेश नीति पूर्वी एशिया पर केंद्रित हो गई है।

अमेरिका शायद चाहता है कि चीन, अफगानिस्तान और अपने जिनजियांग इलाके में बुरी तरह से उलझ जाए ताकि 2022 में होने वाले सीसीपी के चुनावों में चीन के प्रीमियर शी जिनपिंग फिर से सत्ता में ना आ पाए। यह भी हो सकता है कि ताइवान और चीन के इर्द गिर्द महासागरों में अपना वर्चस्व कायम करने के लिए अमेरिका अफगानिस्तान से बाहर आया है? यहां उसे भारत के सहयोग की आवश्यकता है। वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन की आक्रामकता के बाद भारत को यह समीकरण आकर्षक भी लग सकता है।

चीन के आक्रामक उदय के प्रति अमेरिका की रणनीतिक प्रतिक्रिया उसकी इंडो-पैसिफिक रणनीति के रूप में व्यक्त हुई है, जिसका उद्देश्य चीन के उभार को रोकना और उसकी एक दलीय तानाशाही को चुनौती देना है। अमेरिका चाहता है कि भारत क्वाड ब्लॉक में और अधिक अहम भूमिका निभाए। यह एक लंबा गेम प्लान लगता है जो धीरे-धीरे ही खुलेगा।

अमेरिका भले ही अफगान सरकार का साथ छोड़ दे किंतु भारत यह जोखिम नहीं उठा सकता। उसे न केवल अपने निवेश की रक्षा करनी है बल्कि अफगानिस्तान को भारत विरोधी आतंकवादी समूहों के लिये एक और सुरक्षित आश्रय बनने से रोकना है। भारत को काबुल के ऊपर पाकिस्तान के प्रभाव में वृद्धि पर भी संतुलित नियंत्रण कायम रखना होगा। भारत ने अफगानिस्तान में लगभग 3 बिलियन अमरीकी डॉलर से अधिक का निवेश किया है और बडी मेहनत से अफगान सरकार के साथ मज़बूत आर्थिक और रक्षा संबंध विकसित किये हैं।

भारत के पास उपलब्ध विकल्पों में तालिबान से संवाद भी एक है किंतु तालिबान से वार्ता में भारत को कोई वांछनीय परिणाम मिल पाएगा इसकी संभावना कम ही लगती है। इसलिये भारत को तालिबान विरुद्ध ताकतों और अफगान सुरक्षा बलों की सहायता करनी चाहिये। अफगानिस्तान में दीर्घकालिक स्थिरता के लिये अन्य क्षेत्रीय शक्तियों के साथ सहयोग करना चाहिये। अफगानिस्तान में एक राजनीतिक समाधान हेतु भारत और तीन अन्य प्रमुख क्षेत्रीय शक्तियों- चीन, रूस तथा ईरान के बीच हितों का अभिसरण हो रहा है।

भारत का दीर्घावधिक लक्ष्य, संकट के राजनीतिक समाधान की तलाश होना चाहिये। इसके लिए रूसी समर्थन भी जरूरी है। ईरान अफगानिस्तान के साथ एक लंबी भूमि-सीमा साझा करता है और उसके जातीय अल्पसंख्यकों से सांस्कृतिक संबंध रखता है। ईरान में भारत की चाबहार परियोजना का एक उद्देश्य पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए अफगानिस्तान तक प्रत्यक्ष पहुँच कायम करना है।

शरणार्थी समस्या और बहुत जल्दी ड्रग्स से होने वाले समस्याओं के प्रति भी भारत को सोचना होगा। अफगानिस्तान के दर्जनों बड़े नेता-सांसद भागकर भारत पहुंचे है। अफगानिस्तान के नेता अपनी जान बचाने के लिए अलग अलग देशों में शरण ले रहे है। भारत सरकार ने राजनीतिक शरणार्थियों को भारत में आने की इजाजत भी दे दी है।

पाकिस्तान के नजरिए से अगर देखा जाए तो अफगानिस्तान में तालिबान राज स्थापित करवा कर उसने एक अहम जीत दर्ज की है। पाकिस्तान की सबसे बड़ी कमजोरी है उसमें सामरिक गहराई यानी स्ट्रैटेजिक डेप्थ का ना होना है जिसका भारत कभी भी फायदा उठा सकता है लेकिन अफगानिस्तान को एक प्रकार से अपने कब्जे में करके पाकिस्तान ने अपनी इस कमजोरी को छुपा लिया है।

पाकिस्तान अपनी पश्चिमी सीमाओं से सैनिकों को निकालकर भारत के साथ लगे पूर्वी सीमा पर तैनात कर सकता है। इस प्रकार भारत और खासकर कश्मीर में फिर दोबारा अशांति फैलाने के लिए उसे मौका मिल जाएगा । वैसे भी तालिबान के प्रवक्ता ने खुले तौर पर कश्मीर को अफगानिस्तान का हिस्सा बताना शुरू कर दिया है। इस गंभीर मुद्दे पर शीघ्र ही गहनता से विचार करने की आवश्यकता है।

चीन बड़ी सोची समझी रणनीति के तहत विश्व पटल पर भारत के बढ़ते हुए कदमों को रोकने की कोशिश में लगा हुआ है। भारत और चीन के मध्य साउथ एशिया में सिरमौर बनने की होड़ चल रही है। चीन ने 100 बिलियन डॉलर से ज्यादा निवेश चाइना पाकिस्तान इकोनामिक कॉरिडोर यानी सीपैक पर खर्च कर दिया है। अफगानिस्तान में चीन की मौजूदगी उसकी सीपैक की परियोजना को और मजबूती देगी।

इसका मतलब हुआ कि गिलगित बाल्टिस्तान और पीओके के इलाके को हमें वापस लेने के लिए कुछ और समय का इंतजार करना पड़ सकता है। हमारे देश के अंदर बैठे हुए जयचंद और मीर जाफर इस ताक में है, इंतजार कर रहे हैं कि कब उन्हे भारत के खिलाफ काम करने का मौका मिले? सोचने का समय और गंभीर विषय है।

– कर्नल डॉ भारत भूषण वत्स

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